हुस्न को शर्मसार करना ही
इश्क़ का इंतिक़ाम होता है
असरार-उल-हक़ मजाज़
इस महफ़िल-ए-कैफ़-ओ-मस्ती में इस अंजुमन-ए-इरफ़ानी में
सब जाम-ब-कफ़ बैठे ही रहे हम पी भी गए छलका भी गए
असरार-उल-हक़ मजाज़
इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम
हट कर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम
असरार-उल-हक़ मजाज़
कब किया था इस दिल पर हुस्न ने करम इतना
मेहरबाँ और इस दर्जा कब था आसमाँ अपना
असरार-उल-हक़ मजाज़
कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं
ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी
कुछ मुझे भी ख़राब होना था
असरार-उल-हक़ मजाज़
क्यूँ जवानी की मुझे याद आई
मैं ने इक ख़्वाब सा देखा क्या था
असरार-उल-हक़ मजाज़

