अदब ही ज़िंदगी में जब न आया
अदब में इतनी मेहनत किस लिए है
अता आबिदी
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ख़्वाब ही ख़्वाब की ताबीर हुआ तो जाना
ज़िंदगी क्यूँ किसी आँखों के असर में आई
अता आबिदी
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किसी के जिस्म-ओ-जाँ छलनी किसी के बाल-ओ-पर टूटे
जली शाख़ों पे यूँ लटके कबूतर देख आया हूँ
अता आबिदी
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कोई भी ख़ुश नहीं है इस ख़बर से
कि दुनिया जल्द लौटेगी सफ़र से
अता आबिदी
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सब ख़्वाब पुराने हैं हर चंद फ़साने हैं
हम रोज़ बसाते हैं आँखों में नई दुनिया
अता आबिदी
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सब्र की हद भी तो कुछ होती है
कितना पलकों पे सँभालूँ पानी
अता आबिदी
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ज़रूरत ढल गई रिश्ते में वर्ना
यहाँ कोई किसी का अपना कब है
अता आबिदी
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