हँसते हँसते निकल पड़े आँसू
रोते रोते कभी हँसी आई
अनवर ताबाँ
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हर एक शख़्स मिरा शहर में शनासा था
मगर जो ग़ौर से देखा तो मैं अकेला था
अनवर ताबाँ
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हरीम-ए-नाज़ के पर्दे में जो निहाँ था कभी
उसी ने शोख़ अदाएँ दिखा के लूट लिया
अनवर ताबाँ
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इस ख़ौफ़ में कि खुद न भटक जाएँ राह में
भटके हुओं को राह दिखाता नहीं कोई
अनवर ताबाँ
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जी तो ये चाहता है मर जाएँ
ज़िंदगी अब तिरी रज़ा क्या है
अनवर ताबाँ
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ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और
तुम्हारी बात और है हमारी बात और
अनवर ताबाँ
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किसी की बर्क़-ए-नज़र से न बिजलियों से जले
कुछ इस तरह की हो ता'मीर आशियाने की
अनवर ताबाँ
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