डुबोए देता है ख़ुद-आगही का बार मुझे
मैं ढलता नश्शा हूँ मौज-ए-तरब उभार मुझे
अनवर सिद्दीक़ी
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कितने सुबुक-दिल हुए तुझ से बिछड़ने के बाद
उन से भी मिलना पड़ा जिन से मोहब्बत न थी
अनवर सिद्दीक़ी
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सारी शफ़क़ समेट के सूरज चला गया
अब क्या रहा है मौज-ए-शब-ए-तार के सिवा
अनवर सिद्दीक़ी
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उजालती नहीं अब मुझ को कोई तारीकी
सँवारता नहीं अब कोई हादसा मुझ को
अनवर सिद्दीक़ी
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आएगा वो दिन हमारी ज़िंदगी में भी ज़रूर
जो अँधेरों को मिटा कर रौशनी दे जाएगा
अनवर ताबाँ
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आज मग़्मूम क्यूँ हो ऐ 'ताबाँ'
कुछ तो बोलो कि माजरा क्या है
अनवर ताबाँ
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दिल है परेशाँ उन की ख़ातिर
पल भर को आराम नहीं है
अनवर ताबाँ
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