कुछ समझ में मिरी नहीं आता
दिल लगाने से फ़ाएदा क्या है
अनवर ताबाँ
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समझ से काम जो लेता हर एक बशर 'ताबाँ'
न हाहा-कार ही मचते न घर जला करते
अनवर ताबाँ
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शायद आ जाए कभी देखने वो रश्क-ए-मसीह
मैं किसी और से इस वास्ते अच्छा न हुआ
अनवर ताबाँ
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शग़्ल था दश्त-नवर्दी का कभी ऐ 'ताबाँ'
अब गुलिस्ताँ में भी जाते हुए डर लगता है
अनवर ताबाँ
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सितम भी मुझ पे वो करता रहा करम की तरह
वो मेहरबाँ तो न था मेहरबान जैसा था
अनवर ताबाँ
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सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ'
ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा
अनवर ताबाँ
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तुम्हें दिल दे तो दे 'ताबाँ' ये डर है
हमेशा को तुम्हारा हो न जाए
अनवर ताबाँ
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