चाहिए थी शम्अ इस तारीक घर के वास्ते
ख़ाना-ए-दिल में चराग़-ए-इश्क़ रौशन हो गया
नूह नारवी
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चलो 'नूह' तुम को दिखा लाएँ तुम ने
न मय-ख़ाना देखा न बुत-ख़ाना देखा
नूह नारवी
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दम जो निकला तो मुद्दआ निकला
एक के साथ दूसरा निकला
नूह नारवी
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दिखाए पाँच आलम इक पयाम-ए-शौक़ ने मुझ को
उलझना रूठना लड़ना बिगड़ना दूर हो जाना
नूह नारवी
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दिल अपना कहीं ठहरे तो हम भी कहीं ठहरें
इस कूचे में आ रहना उस कूचे में जा रहना
नूह नारवी
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दिल जो दे कर किसी काफ़िर को परेशाँ हो जाए
आफ़ियत उस की है इस में कि मुसलमाँ हो जाए
नूह नारवी
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दिल के दो हिस्से जो कर डाले थे हुस्न-ओ-इश्क़ ने
एक सहरा बन गया और एक गुलशन हो गया
नूह नारवी

