जब वो साथ होता है
हम अकेले होते हैं
नज़ीर क़ैसर
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कभी करना हो अंदाज़ा जब अपने दर्द का मुझ को
मैं उस बेदर्द के दिल को दुखा कर देखा लेता हूँ
नज़ीर क़ैसर
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ख़्वाब क्या था जो मिरे सर में रहा
रात भर इक शोर सा घर में रहा
नज़ीर क़ैसर
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कोई मुझ को ढूँढने वाला
भूल गया है रस्ता मुझ में
नज़ीर क़ैसर
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मैं उसे कैसे जीत सकता हूँ
वो मुझे अपना जिस्म हारती है
नज़ीर क़ैसर
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नया लिबास पहन कर भी
दुनिया वही पुरानी है
नज़ीर क़ैसर
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पत्थर होता जाता हूँ
हँसने दो या रोने दो
नज़ीर क़ैसर
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