रंग लाई है हसरत-ए-तामीर
गिर रही हैं इमारतें क्या क्या
नज़ीर क़ैसर
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उभर रहे हैं कई हाथ शब के पर्दे से
कोई सितारा लिए कोई माहताब लिए
नज़ीर क़ैसर
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उस ने ख़त में भेजे हैं
भीगी रात और भीगा दिन
नज़ीर क़ैसर
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यूँ तुझे देख के चौंक उठती हैं सोई यादें
जैसे सन्नाटे में आवाज़ लगा दे कोई
नज़ीर क़ैसर
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आए तो दिल था बाग़ बाग़ और गए तो दाग़ दाग़
कितनी ख़ुशी वो लाए थे कितना मलाल दे गए
नज़ीर सिद्दीक़ी
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अभी से वो दामन छुड़ाने लगे हो
जो अब तक मिरे हाथ आया नहीं है
नज़ीर सिद्दीक़ी
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और ही वो लोग हैं जिन को है यज़्दाँ की तलाश
मुझ को इंसानों की दुनिया में है इंसाँ की तलाश
नज़ीर सिद्दीक़ी
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