इश्क़ तू भी ज़रा टिका ले कमर
दिल भी अब सो गया है रात गए
नईम जर्रार अहमद
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इश्क़ वो चार सू सफ़र है जहाँ
कोई भी रास्ता नहीं रुकता
नईम जर्रार अहमद
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जितनी आँखें थीं सारी मेरी थीं
जितने मंज़र थे सब तुम्हारे थे
नईम जर्रार अहमद
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मान टूटे तो फिर नहीं जुड़ता
बद-गुमानी कभी न आ के गई
नईम जर्रार अहमद
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मैं ख़ुद को सामने तेरे बिठा कर
ख़ुद अपने से गिला करता रहा हूँ
नईम जर्रार अहमद
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या हुस्न है ना-वाक़िफ़-ए-पिंदार-ए-मोहब्बत
या इश्क़ ही आसानी-ए-अतवार में गुम है
नईम जर्रार अहमद
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ये जानता है पलट कर उसे नहीं आना
वो अपनी ज़ीस्त की खिंचती हुई कमान में है
नईम जर्रार अहमद
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