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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

सारी गवाहियाँ तो मिरे हक़ में आ गईं
लेकिन मिरा बयान ही मेरे ख़िलाफ़ था

नफ़स अम्बालवी




तारीकियाँ क़ुबूल थीं मुझ को तमाम उम्र
लेकिन मैं जुगनुओं की ख़ुशामद न कर सका

नफ़स अम्बालवी




तू दरिया है तो होगा हाँ मगर इतना समझ लेना
तिरे जैसे कई दरिया मिरी आँखों में रहते हैं

नफ़स अम्बालवी




उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है
मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है

नफ़स अम्बालवी




उठा लाया किताबों से वो इक अल्फ़ाज़ का जंगल
सुना है अब मिरी ख़ामोशियों का तर्जुमा होगा

नफ़स अम्बालवी




वो भीड़ में खड़ा है जो पत्थर लिए हुए
कल तक मिरा ख़ुदा था मुझे इतना याद है

नफ़स अम्बालवी




ये इश्क़ के ख़ुतूत भी कितने अजीब हैं
आँखें वो पढ़ रही हैं जो तहरीर भी नहीं

नफ़स अम्बालवी