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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

इंकार कर रहा हूँ तो क़ीमत बुलंद है
बिकने पे आ गया तो गिरा देंगे दाम लोग

नफ़स अम्बालवी




इस शहर में ख़्वाबों की इमारत नहीं बनती
बेहतर है कि ता'मीर का नक़्शा ही बदल लो

नफ़स अम्बालवी




जब भी उस दीवार से मिलता हूँ रो पड़ता हूँ मैं
कुछ न कुछ तो है यक़ीनन उस में पत्थर से अलग

नफ़स अम्बालवी




मरने को मर भी जाऊँ कोई मसअला नहीं
लेकिन ये तय तो हो कि अभी जी रहा हूँ मैं

नफ़स अम्बालवी




मिलते हैं मुस्कुरा के अगरचे तमाम लोग
मर मर के जी रहे हैं मगर सुब्ह-ओ-शाम लोग

नफ़स अम्बालवी




मिरे ख़याल की पर्वाज़ बस तुम्हीं तक थी
फिर इस के बा'द मुझे कोई आसमाँ न मिला

नफ़स अम्बालवी




निगाहों के मनाज़िर बे-सबब धुंधले नहीं पड़ते
हमारी आँख में दरिया कोई ठहरा हुआ होगा

नफ़स अम्बालवी