न सिकंदर है न दारा है न क़ैसर है न जम
बे-महल ख़ाक में हैं क़स्र बनाने वाले
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
नहीं बुतों के तसव्वुर से कोई दिल ख़ाली
ख़ुदा ने उन को दिए हैं मकान सीनों में
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
पूछा अगर किसी ने मिरा आ के हाल-ए-दिल
बे-इख़्तियार आह लबों से निकल गई
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
उर्यां हरारत-ए-तप-ए-फ़ुर्क़त से मैं रहा
हर बार मेरे जिस्म की पोशाक जल गई
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
चमन में शब को घिरा अब्र-ए-नौ-बहार रहा
हुज़ूर आप का क्या क्या न इंतिज़ार रहा
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी
देख लो हम को आज जी भर के
कोई आता नहीं है फिर मर के
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी
गए जो ऐश के दिन मैं शबाब क्या करता
लगा के जान को अपनी अज़ाब क्या करता
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी

