गया शबाब न पैग़ाम-ए-वस्ल-ए-यार आया
जला दो काट के इस नख़्ल में न बार आया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
हम तो अपनों से भी बेगाना हुए उल्फ़त में
तुम जो ग़ैरों से मिले तुम को न ग़ैरत आई
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
हमारे ऐब ने बे-ऐब कर दिया हम को
यही हुनर है कि कोई हुनर नहीं आता
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
इतना तो जज़्ब-ए-इश्क़ ने बारे असर किया
उस को भी अब मलाल है मेरे मलाल का
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
जोश-ए-वहशत यही कहता है निहायत कम है
दो जहाँ से भी अगर वुसअत-ए-सहरा बढ़ जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ख़ुद-फ़रोशी को जो तू निकले ब-शक्ल-ए-यूसुफ़
ऐ सनम तेरी ख़रीदार ख़ुदाई हो जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता
हम जा नहीं सकते उन्हें आना नहीं मिलता
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

