गेसू रुख़ पर हवा से हिलते हैं
चलिए अब दोनों वक़्त मिलते हैं
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी
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मौत से किस को रुस्तगारी है
आज वो कल हमारी बारी है
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी
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साबित ये कर रहा हूँ कि रहमत-शनास हूँ
हर क़िस्म का गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी
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मुट्ठी से जिस तरह कोई जुगनू निकल पड़े
देखा उसे तो आँख से आँसू निकल पड़े
मीसम अली आग़ा
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ऐ मिरे मूनिस ओ ग़म-ख़्वार मुझे मरने दे
बात अब हुक्म की तामील तक आ पहुँची है
मिस्दाक़ आज़मी
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फ़क़त मिलना-मिलाना कम हुआ है
हमारी दोस्ती टूटी नहीं है
मिस्दाक़ आज़मी
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ग़ार वालों की तरह निकला है वो कमरे से आज
उस को इस दुनिया की तब्दीली का अंदाज़ा नहीं
मिस्दाक़ आज़मी
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