काम थे इश्क़ में बहुत पर 'मीर'
हम ही फ़ारिग़ हुए शिताबी से
मीर तक़ी मीर
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कासा-ए-चश्म ले के जूँ नर्गिस
हम ने दीदार की गदाई की
मीर तक़ी मीर
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कहा मैं ने गुल का है कितना सबात
कली ने ये सुन कर तबस्सुम किया
मीर तक़ी मीर
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कहते तो हो यूँ कहते यूँ कहते जो वो आता
ये कहने की बातें हैं कुछ भी न कहा जाता
मीर तक़ी मीर
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कौन कहता है न ग़ैरों पे तुम इमदाद करो
हम फ़रामोशियों को भी कभू याद करो
मीर तक़ी मीर
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कौन लेता था नाम मजनूँ का
जब कि अहद-ए-जुनूँ हमारा था
मीर तक़ी मीर
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ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मय-ख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतिक़ाम लिया
मीर तक़ी मीर
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