खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आँखों की नीम-ख़्वाबी से
मीर तक़ी मीर
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ख़ुदा को काम तो सौंपे हैं मैं ने सब लेकिन
रहे है ख़ौफ़ मुझे वाँ की बे-नियाज़ी का
मीर तक़ी मीर
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किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया
मीर तक़ी मीर
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किसू से दिल नहीं मिलता है या रब
हुआ था किस घड़ी उन से जुदा मैं
मीर तक़ी मीर
कितनी बातें बना के लाऊँ लेक
याद रहतीं तिरे हुज़ूर नहीं
मीर तक़ी मीर
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कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है
मीर तक़ी मीर
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कोहकन क्या पहाड़ तोड़ेगा
इश्क़ ने ज़ोर-आज़माई की
मीर तक़ी मीर
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