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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

सौ सौ तरह के वस्ल ने मरहम रखे वले
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ हैं मिरे वैसे ही तर हनूज़

मीर हसन




शब-ए-अव्वल तो तवक़्क़ो पे तिरे वादे के
सहल होती है बला होती है पर आख़िर-ए-शब

मीर हसन




शैख़ तू नेक-ओ-बद-ए-दुख़्तर-ए-रज़ क्या जाने
वो बिचारी तो तिरे पास न आई न गई

मीर हसन




ताकि इबरत करें और ग़ैर न देखें तुझ को
जी में आता है निकलवाइए दो-चार की आँख

मीर हसन




था रू-ए-ज़मीं तंग ज़ि-बस हम ने निकाली
रहने के लिए शेर के आलम में ज़मीं और

मीर हसन




टुक देख लें चमन को चलो लाला-ज़ार तक
क्या जाने फिर जिएँ न जिएँ हम बहार तक

मीर हसन




तू ख़फ़ा मुझ से हो तो हो लेकिन
मैं तो तुझ से ख़फ़ा नहीं होता

मीर हसन