मोहब्बत का रस्ता अजब गर्म था
क़दम जब धरा ख़ाक पर जल गया
मीर हसन
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मू से सपेद ने नमक इस में मिला दिया
कैफ़िय्यत अब रही नहीं जाम-ए-शराब में
मीर हसन
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न ग़रज़ मुझ को है काफ़िर से न दीं-दार से काम
रोज़-ओ-शब है मुझे उस काकुल-ए-ख़मदार से काम
मीर हसन
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न लेट इस तरह मुँह पर ज़ुल्फ़ को बिखरा के ऐ ज़ालिम
ज़रा उठ बैठ तू इस दम कि दोनों वक़्त मिलते हैं
मीर हसन
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नाख़ुन न पहुँचा आबला-ए-दिल तलक 'हसन'
हम मर गए ये हम से न आख़िर गिरह गई
मीर हसन
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नाक़े से दूर रह गया आख़िर न क़ैस तू
कहते न थे कि पाँव से मत खींच ख़ार को
मीर हसन
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नासेहों के हाथ से छोड़ेंगे रहना शहर का
देखते हैं और दिन दो-चार अब बनती नहीं
मीर हसन
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