क्या ग़ैर क्या अज़ीज़ कोई नौहागर न हो
ऐ जान यूँ निकल कि बदन तक ख़बर न हो
मीर कल्लू अर्श
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मुझ को और यार को दोनों से सरोकार नहीं
कुफ़्र काफ़िर को मुसलमाँ को है इस्लाम पसंद
मीर कल्लू अर्श
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सेह्हत है मरज़ क़ज़ा शिफ़ा है
अल्लाह हकीम है हमारा
मीर कल्लू अर्श
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तोड़ कर काबे को मस्जिद न बनाओ ज़ाहिद
ख़ाना-बर्बाद किसी दिल ही में कर घर पैदा
मीर कल्लू अर्श
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आ ही कूदा था दैर में वाइ'ज़
हम ने टाला ख़ुदा ख़ुदा कर के
मीर मेहदी मजरूह
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आमद आमद ख़िज़ाँ की है शायद
गुल शगुफ़्ता हुआ चमन में है
मीर मेहदी मजरूह
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अब रक़ीब-ए-बुल-हवस हैं इश्क़-बाज़
दिल लगाने से भी नफ़रत हो गई
मीर मेहदी मजरूह
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