है यही शौक़ शहादत का अगर दिल में तो इश्क़
ले ही पहुँचेगा हमें भी तिरी शमशीर तलक
मीर हसन
हम को भी दुश्मनी से तिरे काम कुछ नहीं
तुझ को अगर हमारे नहीं प्यार से ग़रज़
मीर हसन
हम में ही आलम-ए-अकबर हुए गो जुर्म-ए-सग़ीर
मज़हर-ए-जल्वा-ए-हक़ हज़रत-ए-इंसाँ हैं हम
मीर हसन
हो ज़ब्त-ए-नाला क्यूँकि दिल-ए-ना-तवाँ में आह
आतिश कहीं छुपाए से छुपती है ख़स के बीच
मीर हसन
इस को उम्मीद नहीं है कभी फिर बसने के
और वीरानों से इस दिल का है वीराना जुदा
मीर हसन
इश्क़ का अब मर्तबा पहुँचा मुक़ाबिल हुस्न के
बन गए बुत हम भी आख़िर उस सनम की याद में
मीर हसन
इतने आँसू तो न थे दीदा-ए-तर के आगे
अब तो पानी ही भरा रहता है घर के आगे
मीर हसन

