इज़हार-ए-ख़मोशी में है सौ तरह की फ़रियाद
ज़ाहिर का ये पर्दा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मीर हसन
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जान-ओ-दिल हैं उदास से मेरे
उठ गया कौन पास से मेरे
मीर हसन
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जब देखो हूँ उस को तो मुझे आता है ये रश्क
किस किस का ये मंज़ूर-ए-नज़र होवेगा यारब
मीर हसन
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जब लगे होंगे जुदा हज़रत-ए-दिल हम ने कहा
फिर भी मिलिएगा कभी हम से कहा या क़िस्मत
मीर हसन
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जब से जुदा हुआ है वो शोख़ तब से मुझ को
नित आह आह करना और ज़ार ज़ार रोना
मीर हसन
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जब तलक ज़र है तो सब कोई है फिर कोई नहीं
सच है मक्खी भी रहे है शकर-ओ-शीर तलक
मीर हसन
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जैसे कि आज वस्ल हुआ क्या न चाहिए
इक दिन भी आवे ऐसा अगर सौ बरस के बीच
मीर हसन
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