बस गया जब से यार आँखों में
तब से फूली बहार आँखों में
मीर हसन
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बुत-ख़ाना-ए-दिल मेरा काबे के बराबर है
वाजिब है तुझे जानाँ इकराम मिरे दिल का
मीर हसन
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चाहा था ग़रज़ मैं ने इश्क़ ऐसे ही दिलबर का
गर मुझ पे बहुत गुज़रा ग़म इस में तो कम गुज़रा
मीर हसन
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दैर-ओ-काबा ही को जाना कुछ नहीं लाज़िम ग़रज़
जिस तरफ़ पाई ख़बर उस की उधर को उठ गए
मीर हसन
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दर्द करता है तप-ए-इश्क़ की शिद्दत से मिरा
सर जुदा सीना जुदा क़ल्ब जुदा शाना जुदा
मीर हसन
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दरवाज़ा गो खुला है इजाबत का पर 'हसन'
हम किस किस आरज़ू को ख़ुदा से तलब करें
मीर हसन
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दिखा देंगे चालाकी हाथों की नासेह
जो साबित जुनूँ से गरेबाँ रहेगा
मीर हसन
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