झूट-मूट उन से मैं कुछ मस्लहतन बोलूँगा
सच है तू बोल न उठियो दिल-ए-आगाह कि झूट
मीर हसन
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जिस तरह चाहा लिखीं दिल ने कहा यूँ मत लिख
सैकड़ों बार धरा और उठाया काग़ज़
मीर हसन
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काबे को गया छोड़ के क्यूँ दिल को तू ऐ शैख़
टुक जी में समझता तो सही याँ भी तो रब था
मीर हसन
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कहता है तू कि तुझ को पाता नहीं कभी घर
ये झूट सच है देखूँ आज अपने घर रहूँगा
मीर हसन
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कर के बिस्मिल न तू ने फिर देखा
बस इसी ग़म में जान दी हम ने
मीर हसन
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खा के ग़म ख़्वान-ए-इश्क़ के मेहमान
हाथ ख़ून-ए-जिगर से धोते हैं
मीर हसन
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ख़ुदा जाने पलक से क्यूँकि लगती है पलक हमदम
कभी आँखों से हम ने तो न देखा अपने सोने को
मीर हसन
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