तिरा बख़्शा हुआ इक ज़ख़्म प्यारे
चली ठंडी हवा जलने लगा है
ख़ुर्शीद रब्बानी
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उतर के शाख़ से इक एक ज़र्द पत्ते ने
नई रुतों के लिए रास्ता बनाया था
ख़ुर्शीद रब्बानी
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वहशतें इश्क़ और मजबूरी
क्या किसी ख़ास इम्तिहान में हूँ
ख़ुर्शीद रब्बानी
वो तग़ाफ़ुल-शिआर क्या जाने
इश्क़ तो हुस्न की ज़रूरत है
ख़ुर्शीद रब्बानी
ये दिल कि ज़र्द पड़ा था कई ज़मानों से
मैं तेरा नाम लिया और बहार आ गई है
ख़ुर्शीद रब्बानी
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ये कार-ए-मोहब्बत भी क्या कार-ए-मोहब्बत है
इक हर्फ़-ए-तमन्ना है और उस की पज़ीराई
ख़ुर्शीद रब्बानी
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ये कौन आग लगाने पे है यहाँ मामूर
ये कौन शहर को मक़्तल बनाने वाला है
ख़ुर्शीद रब्बानी
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