मिरी मुश्किल मिरी मुश्किल नहीं है
वसीला तेरी आसानी का मैं हूँ
ख़ुर्शीद तलब
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रोज़ दीवार में चुन देता हूँ मैं अपनी अना
रोज़ वो तोड़ के दीवार निकल आती है
ख़ुर्शीद तलब
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सब एक धुँद लिए फिर रहे हैं आँखों में
किसी के चेहरे पे माज़ी न हाल देखता हूँ
ख़ुर्शीद तलब
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सब ने देखा और सब ख़ामोश थे
एक सूफ़ी का मज़ार उड़ता हुआ
ख़ुर्शीद तलब
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'तलब' बड़ी ही अज़िय्यत का काम होता है
बिखरते टूटते रिश्तों का बोझ ढोना भी
ख़ुर्शीद तलब
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उस ने आ कर हाथ माथे पर रखा
और मिनटों में बुख़ार उड़ता हुआ
ख़ुर्शीद तलब
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ज़मीनें तंग हुई जा रही हैं दिल की तरह
हम अब मकान नहीं मक़बरा बनाते हैं
ख़ुर्शीद तलब
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