होती नहीं है यूँही अदा ये नमाज़-ए-इश्क़
याँ शर्त है कि अपने लहू से वज़ू करो
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
जाने क्यूँ इक ख़याल सा आया
मैं न हूँगा तो क्या कमी होगी
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
कोई तो बात होगी कि करने पड़े हमें
अपने ही ख़्वाब अपने ही क़दमों से पाएमाल
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
कोई वक़्त बतला कि तुझ से मिलूँ
मिरी दौड़ती भागती ज़िंदगी
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
क्यूँ हर घड़ी ज़बाँ पे हो जुर्म-ओ-सज़ा का ज़िक्र
क्यूँ हर अमल की फ़िक्र में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा की शर्त
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
लाख सादा सही तेरी ये जबीं की तहरीर
इस से अक्सर मिरे अफ़्कार को मिलती है ज़बाँ
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ़ के क्या देखूँ
उरूज-ए-फ़न मिरी दहलीज़ पर उतार मुझे
ख़लील-उर-रहमान आज़मी

