मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ़ के क्या देखूँ
उरूज-ए-फ़न मिरी दहलीज़ पर उतार मुझे
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
मैं कहाँ हूँ कुछ बता दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!
फिर सदा अपनी सुना दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
मेरे दुश्मन न मुझ को भूल सके
वर्ना रखता है कौन किस को याद
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
'मीर' का तर्ज़ अपनाया सब ने लेकिन ये अंदाज़ कहाँ
'आज़मी'-साहिब आप की ग़ज़लें सुन सुन कर सब हैराँ हैं
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
मिरी नज़र में वही मोहनी सी मूरत है
ये रात हिज्र की है फिर भी ख़ूब-सूरत है
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
न चाहो तुम तो हर इक गाम कितनी दीवारें
जो चाहो तुम तो मिलन की हज़ार सूरत है
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
न जाने किस की हमें उम्र भर तलाश रही
जिसे क़रीब से देखा वो दूसरा निकला
ख़लील-उर-रहमान आज़मी

