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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हाल-ए-दिल उस को सुना कर है बहुत ख़ुश 'कौसर'
लेकिन अब सोच ज़रा क्या तिरी औक़ात रही

कौसर नियाज़ी




हर मरहला-ए-ग़म में मिली इस से तसल्ली
हर मोड़ पे घबरा के तिरा नाम लिया है

कौसर नियाज़ी




जज़्बात में आ कर मरना तो मुश्किल सी कोई मुश्किल ही नहीं
ऐ जान-ए-जहाँ हम तेरे लिए जीना भी गवारा करते हैं

कौसर नियाज़ी




मंजधार में नाव डूब गई तो मौजों से आवाज़ आई
दरिया-ए-मोहब्बत से 'कौसर' यूँ पार उतारा करते हैं

कौसर नियाज़ी




मैं ने हर गाम उसे अव्वल ओ आख़िर जाना
लेकिन उस ने मुझे लम्हों का मुसाफ़िर जाना

कौसर नियाज़ी




परखने वाले मुझे देख इस तरह भी ज़रा
अगर है खोट तो कैसे चमक रहा हूँ मैं

कौसर नियाज़ी




तबाही की घड़ी शायद ज़माने पर नहीं आई
अभी अपने किए पर आदमी शर्मा ही जाता है

कौसर नियाज़ी