मैं ने हर गाम उसे अव्वल ओ आख़िर जाना
लेकिन उस ने मुझे लम्हों का मुसाफ़िर जाना
मैं तो था उस के चमन-ज़ार-ए-मोहब्बत का असीर
लेकिन उस ने मुझे हर शाख़ का ताइर जाना
उस ने इख़्लास के मारे हुए दीवाने को
एक आवारा ओ बदनाम सा शायर जाना
दर-हक़ीक़त यही एज़ाज़ बहुत है 'कौसर'
दो घड़ी उस ने हमें अपना ब-ज़ाहिर जाना
ग़ज़ल
मैं ने हर गाम उसे अव्वल ओ आख़िर जाना
कौसर नियाज़ी

