वो अर्ज़-ए-ग़म पे मिरी उन का एहतिमाम-ए-सुकूत
तमाम शोरिश-ए-तफ़्सील-ए-वाक़िआत गई
क़ौसर जायसी
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ये आरज़ू के सितारे ये इंतिज़ार के फूल
चमक रही हैं ख़ताएँ महक रहे हैं गुनाह
क़ौसर जायसी
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बोझ दिल पर है नदामत का तो ऐसा कर लो
मेरे सीने से किसी और बहाने लग जाओ
कौसर मज़हरी
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चाँद है पानी में या भूले हुए चेहरे का अक्स
साहिल-ए-दरिया पे देखो मैं भी हैरानी में हूँ
कौसर मज़हरी
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एक मुद्दत से ख़मोशी का है पहरा हर-सू
जाने किस ओर गए शोर मचाने वाले
कौसर मज़हरी
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गिरा था बोझ कोई सर से मेरे
उसी को फिर उठाना चाहता हूँ
कौसर मज़हरी
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जाने किस ख़्वाब-ए-परेशाँ का है चक्कर सारा
बिखरा बिखरा हुआ रहता है मिरा घर सारा
कौसर मज़हरी
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