उस की पलकों पे जो चमका था सितारा कोई
देखते देखते महताब हुआ जाता है
कौसर मज़हरी
वही क़तरा जो कभी कुंज-ए-सर-ए-चश्म में था
अब जो फैला है तो सैलाब हुआ जाता है
कौसर मज़हरी
ऐ मसीहा कभी तू भी तो उसे देखने आ
तेरे बीमार को सुनते हैं कि आराम नहीं
कौसर नियाज़ी
अपने वहशत-ज़दा कमरे की इक अलमारी में
तेरी तस्वीर अक़ीदत से सजा रक्खी है
कौसर नियाज़ी
बर-सर-ए-आम इक़रार अगर ना-मुम्किन है तो यूँही सही
कम-अज़-कम इदराक तो कर ले गुन बे-शक मत मान मिरे
कौसर नियाज़ी
बे-सबब आज आँख पुर-नम है
जाने किस बात का मुझे ग़म है
कौसर नियाज़ी
चंद लम्हों के लिए एक मुलाक़ात रही
फिर न वो तू न वो मैं और न वो रात रही
कौसर नियाज़ी

