इश्क़ की दुनिया में क्या क्या हम को सौग़ातें मिलीं
सूनी सुब्हें रोती शामें जागती रातें मिलीं
करम हैदराबादी
वाइज़ ख़ता-मुआफ़ कि रिंदान-ए-मय-कदा
दिल के सिवा किसी का कहा मानते नहीं
करम हैदराबादी
चुभ रहा था दिल में हर दम कर रहा था बे-क़रार
इक अज़िय्यत-नाक पहलू जो मिरी राहत में था
करामत अली करामत
ग़म-ए-फ़िराक़ को सीने से लग के सोने दो
शब-ए-तवील की होगी सहर कभी न कभी
करामत अली करामत
ग़म-ए-हस्ती भला कब मो'तबर हो
मोहब्बत में न जब तक आँख तर हो
करामत अली करामत
हमेशा आग के दरिया में इश्क़ क्यूँ उतरे
कभी तो हुस्न को ग़र्क़-ए-अज़ाब होना था
करामत अली करामत
कोई ज़मीन है तो कोई आसमान है
हर शख़्स अपनी ज़ात में इक दास्तान है
करामत अली करामत

