मैं लफ़्ज़ लफ़्ज़ में तुझ को तलाश करता हूँ
सवाल में नहीं आता न आ जवाब में आ
करामत अली करामत
मैं शु'आ-ए-ज़ात के सीने में गूँजा हूँ कभी
और 'करामत' मैं कभी लम्हों के ख़्वाबों में रहा
करामत अली करामत
मंज़िल पे भी पहुँच के मयस्सर नहीं सकूँ
मजबूर इस क़दर हैं शुऊर-ए-सफ़र से हम
करामत अली करामत
पतवार गिर गई थी समुंदर की गोद में
दिल का सफ़ीना फिर भी लहू के सफ़र में था
करामत अली करामत
सुकून वस्ल में इतना नसीब हो कि न हो
जिस इज़्तिराब से मैं इंतिज़ार करता हूँ
करामत अली करामत
टूट कर कितनों को मजरूह ये कर सकता है
संग तू ने अभी देखा नहीं शीशे का जिगर
करामत अली करामत
वो कौन था जो मिरी ज़िंदगी के दफ़्तर से
हुरूफ़ ले गया ख़ाली किताब छोड़ गया
करामत अली करामत

