इस क़दर मैं ने सुलगते हुए घर देखे हैं
अब तो चुभने लगे आँखों में उजाले मुझ को
कामिल बहज़ादी
क्या तिरे शहर के इंसान हैं पत्थर की तरह
कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं
कामिल बहज़ादी
लोग भोपाल की तारीफ़ किया करते हैं
इस नगर में तो तिरे घर के सिवा कुछ भी नहीं
कामिल बहज़ादी
तअल्लुक़ है न अब तर्क-ए-तअल्लुक़
ख़ुदा जाने ये कैसी दुश्मनी है
कामिल बहज़ादी
ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-दुनिया
'कँवल' इस ज़िंदगी में ग़म के मारों को न चैन आया
कँवल डिबाइवी
हँसी में कटती थीं रातें ख़ुशी में दिन गुज़रता था
'कँवल' माज़ी का अफ़्साना न तुम भूले न हम भूले
कँवल डिबाइवी
जिस ने बुनियाद गुलिस्ताँ की कभी डाली थी
उस को गुलशन से गुज़रने नहीं देती दुनिया
कँवल डिबाइवी

