अक्सर इसी ख़याल ने मायूस कर दिया
शायद तमाम उम्र यूँ ही काटनी पड़े
कामिल अख़्तर
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लम्हों के तार खींचता रहता था रात दिन
इक शख़्स ले गया मिरी सदियाँ समेट के
कामिल अख़्तर
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मंज़रों की भीड़ ऐसी तो कभी देखी न थी
गाँव अच्छा था मगर उस में कोई लड़की न थी
कामिल अख़्तर
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रुतों के रंग बदलते हुए भी बंजर है
वो एक ख़ास इलाक़ा जो दिल के अंदर है
कामिल अख़्तर
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उम्र भर याद रहा अपनी वफ़ाओं की तरह
एक वो अहद जिसे आप ने पूरा न किया
कामिल अख़्तर
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आकाश की हसीन फ़ज़ाओं में खो गया
मैं इस क़दर उड़ा कि ख़लाओं में खो गया
कामिल बहज़ादी
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आप दामन को सितारों से सजाए रखिए
मेरी क़िस्मत में तो पत्थर के सिवा कुछ भी नहीं
कामिल बहज़ादी
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