उस का तो एक लफ़्ज़ भी हम को नहीं है याद
कल रात एक शेर कहा था जो ख़्वाब में
कमाल अहमद सिद्दीक़ी
ज़िंदगी नाम इसी मौज-ए-मय-ए-नाब का है
मय-कदे से जो उठे दार-ओ-रसन तक पहुँचे
कमाल अहमद सिद्दीक़ी
बिखरा बिखरा हूँ एक मुद्दत से
रफ़्ता रफ़्ता सँवर रहा हूँ मैं
कमाल जाफ़री
हमेशा आप को समझा कि आप अपने हैं
हमेशा आप ने समझा कि दूसरे हैं हम
कमाल जाफ़री
क़रीब रह कि भी तू मुझ से दूर दूर रहा
ये और बात कि बरसों से तेरे पास हूँ मैं
कमाल जाफ़री
ज़लज़ला नेपाल में आया कि हिन्दोस्तान में
ज़लज़ले के नाम से थर्रा उठा सारा जहाँ
कमाल जाफ़री
अब तो हर वक़्त वही इतना रुलाता है मुझे
जिस को जाते हुए मैं देख के रो भी न सका
कामिल अख़्तर

