वो तेरे बिछड़ने का समाँ याद जब आया
बीते हुए लम्हों को सिसकते हुए देखा
इशरत क़ादरी
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यूँ ज़िंदगी गुज़र रही है मेरी
जो उन की है वही ख़ुशी है मेरी
इशरत क़ादरी
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ज़ाहिरी शक्ल मेरी ज़िंदा है
और अंदर से मर गया हूँ मैं
इशरत क़ादरी
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कितने बन-बास लिए फिर भी तिरे साथ रहे
हम ने सोचा ही नहीं तुझ से जुदा हो जाना
इशरत रूमानी
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रफ़्ता रफ़्ता ज़ेहन के सब क़ुमक़ुमे बुझ जाएँगे
और इक अंधे नगर का रास्ता रह जाएगा
इशरत रूमानी
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चार जानिब चीख़ती सम्तों का शोर
हाँपते साए थकन और इन्हितात
इशरत ज़फ़र
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चश्मा-ए-आब-ए-रवाँ है जो सराब-ए-जाँ में
उस की हर लहर में रक़्साँ है तरन्नुम तेरा
इशरत ज़फ़र
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