वो जिस ने अश्कों से हार नहीं मानी
किस ख़ामोशी से दरिया में डूब गई
इशरत आफ़रीं
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वो ज़ख़्म चुन के मिरे ख़ार मुझ में छोड़ गया
कि उस को शौक़ था बे-इंतिहा गुलाबों का
इशरत आफ़रीं
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या मुझे तेरी हथेली बूझे
या कोई शोख़ सहेली बूझे
इशरत आफ़रीं
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ये और बात कि कम-हौसला तो मैं भी थी
मगर ये सच है उसे पहले मैं ने चाहा था
इशरत आफ़रीं
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इक साया शरमाता लजाता राह में तन्हा छोड़ गया
मैं परछाईं ढूँड रहा हूँ टूटी हुई दीवारों पर
इशरत क़ादरी
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इन अंधेरों से परे इस शब-ए-ग़म से आगे
इक नई सुब्ह भी है शाम-ए-अलम से आगे
इशरत क़ादरी
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कौन देखेगा मुझ में अब चेहरा
आईना था बिखर गया हूँ मैं
इशरत क़ादरी
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