मज़ा आब-ए-बक़ा का जान-ए-जानाँ
तिरा बोसा लिया होवे सो जाने
इश्क़ औरंगाबादी
मुक़ाबिल हो हमारे कस्ब-ए-तक़लीदी से क्या ताक़त
अभी हम महव कर देते हैं आईने को इक हू में
इश्क़ औरंगाबादी
नहीं मालूम दिल में बैठ के कौन
चश्म की दूरबीं से देखे है
इश्क़ औरंगाबादी
शेवा-ए-अफ़्सुर्दगी को कम न बूझ
ख़ाक का कहते हैं आलम पाक है
इश्क़ औरंगाबादी
तू ने क्या देखा नहीं गुल का परेशाँ अहवाल
ग़ुंचा क्यूँ एेंठा हुआ रहता है ज़रदार की तरह
इश्क़ औरंगाबादी
उस की आँखों के अगर वस्फ़ रक़म कीजिएगा
शाख़-ए-नर्गिस को क़लम कर के क़लम कीजिएगा
इश्क़ औरंगाबादी
ये बुत हिर्स-ओ-हवा के दिल के जब काबा में तोडूँगा
तुम्हारी सुब्हा में कब शैख़-जी ज़ुन्नार छोड़ूँगा
इश्क़ औरंगाबादी

