कभी जो ज़हमत-ए-कार-ए-रफ़ू नहीं करता
हमारे ज़ख़्म उसी चारागर के नाम तमाम
इरफ़ान सिद्दीक़ी
कहा था तुम ने कि लाता है कौन इश्क़ की ताब
सो हम जवाब तुम्हारे सवाल ही के तो हैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ख़िराज माँग रही है वो शाह-बानू-ए-शहर
सो हम भी हदिया-ए-दस्त-ए-तलब गुज़ारते हैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ख़ुदा करे सफ़-ए-सरदादगाँ न हो ख़ाली
जो मैं गिरूँ तो कोई दूसरा निकल आए
इरफ़ान सिद्दीक़ी
कुछ इश्क़ के निसाब में कमज़ोर हम भी हैं
कुछ पर्चा-ए-सवाल भी आसान चाहिए
इरफ़ान सिद्दीक़ी
मगर गिरफ़्त में आता नहीं बदन उस का
ख़याल ढूँढता रहता है इस्तिआरा कोई
इरफ़ान सिद्दीक़ी
मैं चाहता हूँ यहीं सारे फ़ैसले हो जाएँ
कि इस के ब'अद ये दुनिया कहाँ से लाऊँगा मैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी

