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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हू का आलम है गिरफ़्तारों की आबादी में
हम तो सुनते थे कि ज़ंजीर-ए-गिराँ बोलती है

इरफ़ान सिद्दीक़ी




इश्क़ क्या कार-ए-हवस भी कोई आसान नहीं
ख़ैर से पहले इसी काम के क़ाबिल हो जाओ

इरफ़ान सिद्दीक़ी




जान हम कार-ए-मोहब्बत का सिला चाहते थे
दिल-ए-सादा कोई मज़दूर है उजरत कैसी

इरफ़ान सिद्दीक़ी




जाने क्या ठान के उठता हूँ निकलने के लिए
जाने क्या सोच के दरवाज़े से लौट आता हूँ

इरफ़ान सिद्दीक़ी




जिस्म की रानाइयों तक ख़्वाहिशों की भीड़ है
ये तमाशा ख़त्म हो जाए तो घर जाएँगे लोग

इरफ़ान सिद्दीक़ी




जो कुछ हुआ वो कैसे हुआ जानता हूँ मैं
जो कुछ नहीं हुआ वो बता क्यूँ नहीं हुआ

इरफ़ान सिद्दीक़ी




जो तीर बूढ़ों की फ़रियाद तक नहीं सुनते
तो उन के सामने बच्चों का मुस्कुराना क्या

इरफ़ान सिद्दीक़ी