एक मैं हूँ कि इस आशोब-ए-नवा में चुप हूँ
वर्ना दुनिया मिरे ज़ख़्मों की ज़बाँ बोलती है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
है बहुत कुछ मिरी ताबीर की दुनिया तुझ में
फिर भी कुछ है कि जो ख़्वाबों के जहाँ से कम है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
हम बड़े अहल-ए-ख़िरद बनते थे ये क्या हो गया
अक़्ल का हर मशवरा दीवाना-पन लगने लगा
इरफ़ान सिद्दीक़ी
हम कौन शनावर थे कि यूँ पार उतरते
सूखे हुए होंटों की दुआ ले गई हम को
इरफ़ान सिद्दीक़ी
हम ने देखा ही था दुनिया को अभी उस के बग़ैर
लीजिए बीच में फिर दीदा-ए-तर आ गए हैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी
हम ने मुद्दत से उलट रक्खा है कासा अपना
दस्त-ए-दादार तिरे दिरहम-ओ-दीनार पे ख़ाक
इरफ़ान सिद्दीक़ी
हम सब आईना-दर-आईना-दर-आईना हैं
क्या ख़बर कौन कहाँ किस की तरफ़ देखता है
इरफ़ान सिद्दीक़ी

