EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हाथ फैलाऊँ मैं ईसा-नफ़सों के आगे
दर्द पहलू में मिरे है मगर इतना भी नहीं

इक़बाल अज़ीम




हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते
अब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते

इक़बाल अज़ीम




इस जश्न-ए-चराग़ाँ से तो बेहतर थे अँधेरे
इन झूटे चराग़ों को बुझा क्यूँ नहीं देते

इक़बाल अज़ीम




जब घर की आग बुझी तो कुछ सामान बचा था जलने से
सो वो भी उन के हाथ लगा जो आग बुझाने आए थे

इक़बाल अज़ीम




झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर
सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े

इक़बाल अज़ीम




जिस में न कोई रंग न आहंग न ख़ुशबू
तुम ऐसे गुलिस्ताँ को जला क्यूँ नहीं देते

इक़बाल अज़ीम




जुनूँ को होश कहाँ एहतिमाम-ए-ग़ारत का
फ़साद जो भी जहाँ में हुआ ख़िरद से हुआ

इक़बाल अज़ीम