ख़ुद को जब भूल से जाते हैं तो यूँ लगता है
ज़िंदगी तेरे अज़ाबों से निकल आए हैं
इक़बाल अशहर कुरेशी
आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब
ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे
इक़बाल अज़ीम
अब हम भी सोचते हैं कि बाज़ार गर्म है
अपना ज़मीर बेच के दुनिया ख़रीद लें
इक़बाल अज़ीम
ऐ अहल-ए-वफ़ा दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
सोए हुए ज़ख़्मों को जगा क्यूँ नहीं देते
इक़बाल अज़ीम
अपनी मिट्टी ही पे चलने का सलीक़ा सीखो
संग-ए-मरमर पे चलोगे तो फिसल जाओगे
इक़बाल अज़ीम
बारहा उन से न मिलने की क़सम खाता हूँ मैं
और फिर ये बात क़स्दन भूल भी जाता हूँ मैं
इक़बाल अज़ीम
बे-नियाज़ाना गुज़र जाए गुज़रने वाला
मेरे पिंदार को अब शौक़-ए-तमाशा भी नहीं
इक़बाल अज़ीम

