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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

जब नहीं कुछ ए'तिबार-ए-ज़िंदगी
इस जहाँ का शाद क्या नाशाद क्या

इम्दाद इमाम असर




कैसा आना कैसा जाना मेरे घर क्या आओगे
ग़ैरों के घर जाने से तुम फ़ुर्सत किस दिन पाते हो

इम्दाद इमाम असर




करता है ऐ 'असर' दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता का गिला
आशिक़ वो क्या कि ख़स्ता-ए-तेग़-ए-जफ़ा न हो

इम्दाद इमाम असर




ख़ुदा जाने 'असर' को क्या हुआ है
रहा करता है चुप दो दो पहर तक

इम्दाद इमाम असर




ख़ूब-ओ-ज़िश्त-ए-जहाँ का फ़र्क़ न पूछ
मौत जब आई सब बराबर था

इम्दाद इमाम असर




कुछ समझ कर उस मह-ए-ख़ूबी से की थी दोस्ती
ये न समझे थे कि दुश्मन आसमाँ हो जाएगा

इम्दाद इमाम असर




लोग जब तेरा नाम लेते हैं
हम कलेजे को थाम लेते हैं

इम्दाद इमाम असर