ज़ाहिदो दावत-ए-रिंदाँ है शराब और कबाब
कभी मयख़ाने में भी रोज़ा-कुशाई हो जाए
इमदाद अली बहर
ज़ालिम हमारी आज की ये बात याद रख
इतना भी दिल-जलों का सताना भला नहीं
इमदाद अली बहर
ख़िज़ाँ का ज़हर सारे शहर की रग रग में उतरा है
गली-कूचों में अब तो ज़र्द चेहरे देखने होंगे
इम्दाद हमदानी
मुसालहत का पढ़ा है जब से निसाब मैं ने
सलीक़ा दुनिया में ज़िंदा रहने का आ गया है
इम्दाद हमदानी
आइना देख के फ़रमाते हैं
किस ग़ज़ब की है जवानी मेरी
इम्दाद इमाम असर
अब जहाँ पर है शैख़ की मस्जिद
पहले उस जा शराब-ख़ाना था
इम्दाद इमाम असर
बनाते हैं हज़ारों ज़ख़्म-ए-ख़ंदाँ ख़ंजर-ए-ग़म से
दिल-ए-नाशाद को हम इस तरह पुर-शाद करते हैं
इम्दाद इमाम असर

