रात दिन नाक़ूस कहते हैं ब-आवाज़-ए-बुलंद
दैर से बेहतर है काबा गर बुतों में तू नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
रश्क से नाम नहीं लेते कि सुन ले न कोई
दिल ही दिल में उसे हम याद किया करते हैं
इमाम बख़्श नासिख़
रिफ़अत कभी किसी की गवारा यहाँ नहीं
जिस सर-ज़मीं के हम हैं वहाँ आसमाँ नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
शुबह 'नासिख़' नहीं कुछ 'मीर' की उस्तादी में
आप बे-बहरा है जो मो'तक़िद-ए-'मीर' नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
सियह-बख़्ती में कब कोई किसी का साथ देता है
कि तारीकी में साया भी जुदा रहता है इंसाँ से
इमाम बख़्श नासिख़
ताज़गी है सुख़न-ए-कुहना में ये बाद-ए-वफ़ात
लोग अक्सर मिरे जीने का गुमाँ रखते हैं
इमाम बख़्श नासिख़
तकल्लुम ही फ़क़त है उस सनम का
ख़ुदा की तरह गोया बे दहां है
इमाम बख़्श नासिख़

