कोई समझाओ उन्हें बहर-ए-ख़ुदा ऐ मोमिनो
उस सनम के इश्क़ में जो मुझ को समझाते हैं लोग
ग़मगीन देहलवी
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मेरी ये आरज़ू है वक़्त-ए-मर्ग
उस की आवाज़ कान में आवे
ग़मगीन देहलवी
मुझे जो दोस्ती है उस को दुश्मनी मुझ से
न इख़्तियार है उस का न मेरा चारा है
ग़मगीन देहलवी
शम्अ-रू आशिक़ को अपने यूँ जलाना चाहिए
कुछ हँसाना चाहिए और कुछ रुलाना चाहिए
ग़मगीन देहलवी
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वो लुत्फ़ उठाएगा सफ़र का
आप-अपने में जो सफ़र करेगा
ग़मगीन देहलवी
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अजीब बात हमारा ही ख़ूँ हुआ पानी
हमीं ने आग में अपने बदन भिगोए थे
ग़ज़नफ़र
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बच के दुनिया से घर चले आए
घर से बचने मगर किधर जाएँ
ग़ज़नफ़र
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