न जाने किस तरह बिस्तर में घुस कर बैठ जाती हैं
वो आवाज़ें जिन्हें हम रोज़ बाहर छोड़ आते हैं
ग़ज़नफ़र
रफ़्ता रफ़्ता आँखों को हैरानी दे कर जाएगा
ख़्वाबों का ये शौक़ हमें वीरानी दे कर जाएगा
ग़ज़नफ़र
तुम्हारे होते हुए लोग क्यूँ भटकते हैं
कहीं पे ख़िज़्र नज़र आए तो सवाल करूँ
ग़ज़नफ़र
ज़ेहन के ख़ानों में जाने वक़्त ने क्या भर दिया
बे-सबब होने लगी इक एक से अन-बन मिरी
ग़ज़नफ़र
अजब तरह का अधूरापन है मिरे बयाँ में
सो मेरा क़िस्सा कहीं सुनाने में रह गया है
ग़ज़नफ़र हाशमी
कोई सबब तो था कि 'ग़ौस' फ़हम-ओ-ज़का के बावजूद
कार-ए-सवाब छोड़ कर कार-ए-गुनाह में रहे
गाैस मथरावी
कब से बंजर थी नज़र ख़्वाब तो आया
शुक्र है दश्त में सैलाब तो आया
ग़ुफ़रान अमजद

