उस माह-रू पे आँख किसी की न पड़ सकी
जल्वा था तूर का कि सरासर वो नूर था
जोर्ज पेश शोर
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ज़र्रे की तरह ख़ाक में पामाल हो गए
वो जिन का आसमाँ पे सर-ए-पुर-ग़ुरूर था
जोर्ज पेश शोर
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भले ही छाँव न दे आसरा तो देता है
ये आरज़ू का शजर है ख़िज़ाँ-रसीदा सही
ग़ालिब अयाज़
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हम उस के जब्र का क़िस्सा तमाम चाहते हैं
और उस की तेग़ हमारा ज़वाल चाहती है
ग़ालिब अयाज़
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हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए
ये रेत जैसा बदन आँधियों के काम तो आए
ग़ालिब अयाज़
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फिर यही रुत हो ऐन मुमकिन है
पर तिरा इंतिज़ार हो कि न हो
ग़ालिब अयाज़
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तमाम उम्र उसे चाहना न था मुमकिन
कभी कभी तो वो इस दिल पे बार बन के रहा
ग़ालिब अयाज़
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